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कैसे कोई ग़ज़ल कहता होगा...

 मैं तो इक नज़्म तक नहीं कह पा रहा जब से तुझ को देखा है चांद  कैसे कोई ग़ज़ल कहता होगा तेरे इश्क़ की चांदनी रातों में  कैसे कोई ग़ज़ल कहता होगा तेरे इश्क़ की मखमली बाहों में कैसे फूल खिलाते होंगे राहों में यादों के नाज़ुक कोरे पन्नों पर कैसे लबों से शबनम धरता होगा कैसे दरिया का पानी बहता होगा तेरे इश्क की चांदनी रातों में  कैसे कोई ग़ज़ल कहता होगा  ये सर्द हवाएं है कि तुम हो यहीं कहीं मगर कोई कहता है तुम नहीं हो कहीं कहां हो कैसे हो कैसे जान लेते होंगे इतने दूर से भला कैसे पहचान लेते होंगे यकीनन तू ही उनसे कुछ कहता होगा फिर तू ही छुप-छुप के उन्हें सुनता होगा फिर अचानक आकर ख़बर करता होगा तेरे इश्क़ की चांदनी रातों में कैसे कोई ग़ज़ल कहता होगा बालाएं लेते हुए नरम हाथ होंगे दुआएं देते हुए सितारे साथ होंगे कैसी सुर ताल होगी कैसे गान होंगे रोशनी होगी तो चराग मेहमान होंगे खुश ख्वाहिशों के सारे खानदान होंगे  लफ़्ज़ कितने ही महरूम बेजान होंगे  कैसे कोई उनमें मानी भरता होगा तेरे इश्क़ की चांदनी रातों में कैसे कोई ग़ज़ल कहता होगा        ...

परिचय

 

अक्षरांजलि : समय, साहित्य और रचनाधर्मिता के लिए प्रतिबद्ध शोध और विमर्श केंद्रित अर्धवार्षिक ई-पत्रिका है। पत्रिका का उद्देश्य समय, साहित्य और रचनाधर्मिता के क्षेत्र में विमर्श व शोध को बढ़ावा देना है। अक्षरांजलि पत्रिका साहित्य और कला के क्षेत्र में सार्थक संवाद और रचनात्मक अभिव्यक्ति के लिए एक सशक्त मंच प्रदान करती है। पत्रिका में विभिन्न वैचारिक स्तंभों का समावेश किया गया है, जो इस प्रकार हैं- भाषा, साहित्य और संस्कृति (आलेख), मीडिया और सिनेमा (आलेख), समकालीन विमर्श (दलित विमर्श, आदिवासी विमर्श, स्त्री विमर्श आदि), शोध पत्र, कविता, कहानी, लघु कथा, बाल साहित्य, लोक साहित्य, रंगमंच, प्रवासी साहित्य, पुस्तक समीक्षा, साक्षात्कार, अनुवाद, साहित्य दर्शन आदि।अक्षरांजलि का उद्देश्य भारतीय सामासिक संस्कृति, जीवन-दर्शन तथा इसकी एकता और अखंडता को सुदृढ़ करने में सहायक संभावित वैचारिक विकल्पों की खोज करना है, साथ ही यह कला जगत के समकालीन प्रतिमानों की पड़ताल और नवाचार को भी प्रोत्साहित करती है।

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