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कैसे कोई ग़ज़ल कहता होगा...

 मैं तो इक नज़्म तक नहीं कह पा रहा जब से तुझ को देखा है चांद  कैसे कोई ग़ज़ल कहता होगा तेरे इश्क़ की चांदनी रातों में  कैसे कोई ग़ज़ल कहता होगा तेरे इश्क़ की मखमली बाहों में कैसे फूल खिलाते होंगे राहों में यादों के नाज़ुक कोरे पन्नों पर कैसे लबों से शबनम धरता होगा कैसे दरिया का पानी बहता होगा तेरे इश्क की चांदनी रातों में  कैसे कोई ग़ज़ल कहता होगा  ये सर्द हवाएं है कि तुम हो यहीं कहीं मगर कोई कहता है तुम नहीं हो कहीं कहां हो कैसे हो कैसे जान लेते होंगे इतने दूर से भला कैसे पहचान लेते होंगे यकीनन तू ही उनसे कुछ कहता होगा फिर तू ही छुप-छुप के उन्हें सुनता होगा फिर अचानक आकर ख़बर करता होगा तेरे इश्क़ की चांदनी रातों में कैसे कोई ग़ज़ल कहता होगा बालाएं लेते हुए नरम हाथ होंगे दुआएं देते हुए सितारे साथ होंगे कैसी सुर ताल होगी कैसे गान होंगे रोशनी होगी तो चराग मेहमान होंगे खुश ख्वाहिशों के सारे खानदान होंगे  लफ़्ज़ कितने ही महरूम बेजान होंगे  कैसे कोई उनमें मानी भरता होगा तेरे इश्क़ की चांदनी रातों में कैसे कोई ग़ज़ल कहता होगा        ...

प्रवेशांक

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4) बीज शब्द या संकेत शब्द (शोध आलेख के कुछ प्रमुख 10 शब्द)
5) प्रस्तावना / बीज शब्द / शोध आलेख (संपूर्ण लेख)
6) निष्कर्ष (अनिवार्य)
7) संदर्भ सूची (APA or MLA Format) में हो। 

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