Skip to main content

Posts

Showing posts from 2025

कैसे कोई ग़ज़ल कहता होगा...

 मैं तो इक नज़्म तक नहीं कह पा रहा जब से तुझ को देखा है चांद  कैसे कोई ग़ज़ल कहता होगा तेरे इश्क़ की चांदनी रातों में  कैसे कोई ग़ज़ल कहता होगा तेरे इश्क़ की मखमली बाहों में कैसे फूल खिलाते होंगे राहों में यादों के नाज़ुक कोरे पन्नों पर कैसे लबों से शबनम धरता होगा कैसे दरिया का पानी बहता होगा तेरे इश्क की चांदनी रातों में  कैसे कोई ग़ज़ल कहता होगा  ये सर्द हवाएं है कि तुम हो यहीं कहीं मगर कोई कहता है तुम नहीं हो कहीं कहां हो कैसे हो कैसे जान लेते होंगे इतने दूर से भला कैसे पहचान लेते होंगे यकीनन तू ही उनसे कुछ कहता होगा फिर तू ही छुप-छुप के उन्हें सुनता होगा फिर अचानक आकर ख़बर करता होगा तेरे इश्क़ की चांदनी रातों में कैसे कोई ग़ज़ल कहता होगा बालाएं लेते हुए नरम हाथ होंगे दुआएं देते हुए सितारे साथ होंगे कैसी सुर ताल होगी कैसे गान होंगे रोशनी होगी तो चराग मेहमान होंगे खुश ख्वाहिशों के सारे खानदान होंगे  लफ़्ज़ कितने ही महरूम बेजान होंगे  कैसे कोई उनमें मानी भरता होगा तेरे इश्क़ की चांदनी रातों में कैसे कोई ग़ज़ल कहता होगा        ...

कैसे कोई ग़ज़ल कहता होगा...

 मैं तो इक नज़्म तक नहीं कह पा रहा जब से तुझ को देखा है चांद  कैसे कोई ग़ज़ल कहता होगा तेरे इश्क़ की चांदनी रातों में  कैसे कोई ग़ज़ल कहता होगा तेरे इश्क़ की मखमली बाहों में कैसे फूल खिलाते होंगे राहों में यादों के नाज़ुक कोरे पन्नों पर कैसे लबों से शबनम धरता होगा कैसे दरिया का पानी बहता होगा तेरे इश्क की चांदनी रातों में  कैसे कोई ग़ज़ल कहता होगा  ये सर्द हवाएं है कि तुम हो यहीं कहीं मगर कोई कहता है तुम नहीं हो कहीं कहां हो कैसे हो कैसे जान लेते होंगे इतने दूर से भला कैसे पहचान लेते होंगे यकीनन तू ही उनसे कुछ कहता होगा फिर तू ही छुप-छुप के उन्हें सुनता होगा फिर अचानक आकर ख़बर करता होगा तेरे इश्क़ की चांदनी रातों में कैसे कोई ग़ज़ल कहता होगा बालाएं लेते हुए नरम हाथ होंगे दुआएं देते हुए सितारे साथ होंगे कैसी सुर ताल होगी कैसे गान होंगे रोशनी होगी तो चराग मेहमान होंगे खुश ख्वाहिशों के सारे खानदान होंगे  लफ़्ज़ कितने ही महरूम बेजान होंगे  कैसे कोई उनमें मानी भरता होगा तेरे इश्क़ की चांदनी रातों में कैसे कोई ग़ज़ल कहता होगा        ...

अनंत और असीमित

  इस समय ज़िंदगी गणित की एक ऐसी शिक्षिका थी जो जान चुकी थी  कि मुझे तेरह का पहाड़ा नहीं आता और अक्सर सत्रह के पहाड़े में अटक जाती हूँ मैं, इसीलिए ज़िंदगी मुझे उलझाए जा रही थी  कुछ ऐसी ही गुना-भाग में, जैसे तुम मिले मुझे  कुछ घटा और जमा करने के बाद ज़िंदगी ने दिया मुझे सबसे कठिनतम पहाड़ा तुम्हें अलविदा कहने का। मुझे बचपन से ही पसंद नहीं था किसी का भी मुझे छोड़ कर चले जाना।  मैं भीतर तक मायूस हो जाती जब-जब किसी ने विदा ली मुझसे। मगर तुम्हारा मुझसे अलविदा कहना छोड़ गया ढेरों सवाल मेरे मन में जो रह जाएँगे  यूँ ही अनसुलझे से। यूँ तो कितने ही साथ छूट गये मुझसे बीच मझदार में मगर तुमसे ली गई विदा ने छोड़ दिया कुछ अधूरा सा  उस साथ को जिसे होना चाहिए था अनंत और असीमित। गरिमा भाटी “गौरी” फ़रीदाबाद, हरियाणा

हाथ

  उसका हाथ अपने हाथ में लेते हुए मैंने सोचा दुनिया को हाथ की तरह गर्म और सुंदर होना चाहिए।                                                                                         ... केदारनाथ सिंह

वर्धा में बसंत

बसंत में यहाँ पत्तियाँ झुलस जाती हैं झुरझुरा जाते हैं डाल  ...और तीखी धूप में- कार कुच-कुच हो जाता है विषधर चमकता हुआ एकदम लोहटन सा! इस बेस्वादी समय में- बच्चे विश्वविद्यालय के ढाबों पर चाय की दो घूँट से अपने भीतर चषक भरते हैं, सूने में जीवन को तरासने की एक मुकम्मल कोशिश; एक सुंदर आकृति- पहाड़ियों के बीच में, तपती दुपहरी में। फहफह कपास सिकुड़ कर टिमटिमा रहा होता है मद्धिम-मद्धिम! जैसे दीये में लगा दिये हों बिना तेल की बाती।                         नवनीत सिंह                         महात्मा गांधी अं. हिं. विश्वविद्यालय वर्धा

संयोग था

  तुम्हारा मेरी ज़िंदगी में आना, जैसे कोई अजनबी राह चलते, अचानक से अपना बन जाए। अप्रत्याशित था, तुम्हारा मुझसे प्रेम करना, जैसे सूखी धरती पर, पहली बारिश की बूँदें गिरें। और मैं? निस्वार्थ लीन हो गया, उस प्रेम के हर एक क्षण में, हर एक स्पर्श में, जो केवल भावनाओं से बना था। शायद सत्य ही है, प्रेम में शरीर का वजूद घुल जाता है, मन और आत्मा के बीच, एक गहरी साजिश सी होती है। जहां शब्द मौन हो जाते हैं, पर आंखें बोलती हैं, और दिलों की धड़कनें, एक दूसरे की भाषा समझने लगती हैं।                                                  ...अमित अन्वेष

मत्स्य कन्या का जादू

उस सुबह रोज़ की तरह  आसमान से झाँक रहा था सूरज  हल्के बादल ज़रूर थे पर हवा तेज़ नहीं थी फिर भी समुद्र में कल्लोल करने के लिए  इठला रही थीं किनारे पर बंधी नावें पीटर और पोनम्मा संभाल रहे थे  अपना नायलन से बना  मछली पकड़ने का जाल  वे हर रोज़ निकलते हैं इसी व्यवसाय यात्रा पर! अद्भुत कहानी है पीटर और पोनम्मा की जिसे मैंने कल रात  सेंट जोसफ चर्च के पादरी से सुना चलिए आपको भी सुनाता हूँ। मछुआरों के बच्चे नहीं खेलते गिल्ली डंडा  उन्हें पसंद नहीं फुटबॉल या हॉकी वे तो बस चलना सीखते ही  उतर पड़ते हैं समुद्र में  किशोर होते ही सिलने लगते हैं  नायलन का फटा जाल जिसे रोज घायल कर देती हैं  शैतान मछलियाँ वयस्क होते ही मछुआरों के बच्चे  समुद्र पर दौड़ाने लगते हैं नावें जैसे अमीरों के बच्चे  खुली सड़कों पर दौड़ाते हैं स्पोर्ट्स बाइक वे भयभीत नहीं होते  काले, हरे, नीले उछलते जल से वे जल से प्रेम करने लगते हैं।  बाईस साल का था फिलिप,  लम्बा, सुते हुए शरीर का काला नौजवान जिस पर मरती थीं  दर्जनों मछुआरों की अंगड़ाईयाँ तोड़ती बेटिय...

मुझसे किसी ने प्यार नहीं किया

मुझसे किसी ने प्यार नहीं किया किन्तु पीड़ा ने किया । वह मेरे जन्म से मेरा साथ गहे है । वह ईर्ष्यालु चोर जिसने पहले मेरे खिलौने चुराए और फिर छोड़ दिया मुझे मेरी रिक्तता के साथ । मेरे बाग में चहकती चिड़ियाँ उसकी अन्तहीन कराहों से डरती हैं । उसने मुझसे मेरी मुहब्बत छीन ली जब मुझे उसकी ज़रूरत थी । और फिर छोड़ दिया मुझे एकाकी । ओ मेरे पीड़ा! मैं तुझसे नाराज़ हूँ , पर मेरे पास वक़्त नहीं बचा है तुझसे नफ़रत करने का । तेरी बलिष्ठ बाँहों में जकड़ कर क़ैद हुई मैं प्रेम नहीं , बस तुझे ही चाहती हूँ ।                                                     मैरी एलीज़ाबेथ कोलरिज

मेरे साथी

कविता  नीड़ के निर्माण में ईंट पहली डाल कर चल पड़ा हूँ खोज में - मै साथियों की! मै जानता हूँ कि बड़ी मुश्किल डगर है, मै जानता हूँ कि सभी कांटे उधर हैं, मै जानता हूँ कि उधर है मौत का दरिया, पर उसी के पार है मेरे साथियों का घर। मेरे साथी जो बहक गए हैं किसी शातिर के भुलावे में पड़कर उनकी आँखों पर परदा डाल दिया है आधुनिकता का, भौतिकता का, थोथी नैतिकता का कुछ और भी हैं जो जाल फैंकते हैं उन्हे अपनी हरम में लेने के लिए कोई त्रिशूल देता है कोई बंदूक देता है कोई जेहादी बनाता है कोई समाजवादी। मेरे अबोध साथी जो - खेतों में काम करते थे, परिवार के साथ हंसी खुशी रहते थे, सरसों का साग मक्के की रोटी खाते थे, तुतलाती बिटिया का माथा चूमते थे; बैलों की जोड़ी हीरा-मोती एक कुत्ता झबरा भी होता था उनका... खलिहान का बूढ़ा बरगद, और उसकी छावं में बैठती पंचायत, फिर कौवे की कावं -कावं... ...सब छोड़ दिया साथियों ने मेरे साथियों की ये हालत सरकार की रणनीति के कारण है, पूरा-पूरा हाथ है इन बुद्धिजीवियों का, बगिया को छिन्न -भिन्न करने में! मेरे साथियों ने कभी नहीं चाहा, कि सर कलम हो अपनों का सपनों का, मान का, सम्मा...

रचना आमंत्रित

    1.       यह एक प्रवेशांक अंक है। 2.        इस अंक के लिए अपनी रचनाएँ editorashranjali@gmail.com पर भेजने का कष्ट करें। 3.        रचना भेजने से पूर्व नियमावली जरूर देखें। 
हताशा से एक व्यक्ति बैठ गया था व्यक्ति को मैं नहीं जानता था हताशा को जानता था इसलिए मैं उस व्यक्ति के पास गया मैंने हाथ बढ़ाया मेरा हाथ पकड़कर वह खड़ा हुआ मुझे वह नहीं जानता था मेरे हाथ बढ़ाने को जानता था हम दोनों साथ चले दोनों एक दूसरे को नहीं जानते थे साथ चलने को जानते थे।                                      विनोद कुमार शुक्ल