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कैसे कोई ग़ज़ल कहता होगा...

 मैं तो इक नज़्म तक नहीं कह पा रहा जब से तुझ को देखा है चांद  कैसे कोई ग़ज़ल कहता होगा तेरे इश्क़ की चांदनी रातों में  कैसे कोई ग़ज़ल कहता होगा तेरे इश्क़ की मखमली बाहों में कैसे फूल खिलाते होंगे राहों में यादों के नाज़ुक कोरे पन्नों पर कैसे लबों से शबनम धरता होगा कैसे दरिया का पानी बहता होगा तेरे इश्क की चांदनी रातों में  कैसे कोई ग़ज़ल कहता होगा  ये सर्द हवाएं है कि तुम हो यहीं कहीं मगर कोई कहता है तुम नहीं हो कहीं कहां हो कैसे हो कैसे जान लेते होंगे इतने दूर से भला कैसे पहचान लेते होंगे यकीनन तू ही उनसे कुछ कहता होगा फिर तू ही छुप-छुप के उन्हें सुनता होगा फिर अचानक आकर ख़बर करता होगा तेरे इश्क़ की चांदनी रातों में कैसे कोई ग़ज़ल कहता होगा बालाएं लेते हुए नरम हाथ होंगे दुआएं देते हुए सितारे साथ होंगे कैसी सुर ताल होगी कैसे गान होंगे रोशनी होगी तो चराग मेहमान होंगे खुश ख्वाहिशों के सारे खानदान होंगे  लफ़्ज़ कितने ही महरूम बेजान होंगे  कैसे कोई उनमें मानी भरता होगा तेरे इश्क़ की चांदनी रातों में कैसे कोई ग़ज़ल कहता होगा        ...

संयोग था

 


तुम्हारा मेरी ज़िंदगी में आना,
जैसे कोई अजनबी राह चलते,
अचानक से अपना बन जाए।
अप्रत्याशित था,
तुम्हारा मुझसे प्रेम करना,
जैसे सूखी धरती पर,
पहली बारिश की बूँदें गिरें।

और मैं?
निस्वार्थ लीन हो गया,
उस प्रेम के हर एक क्षण में,
हर एक स्पर्श में,
जो केवल भावनाओं से बना था।

शायद सत्य ही है,
प्रेम में शरीर का वजूद घुल जाता है,
मन और आत्मा के बीच,
एक गहरी साजिश सी होती है।
जहां शब्द मौन हो जाते हैं,
पर आंखें बोलती हैं,
और दिलों की धड़कनें,
एक दूसरे की भाषा समझने लगती हैं।

                                                 ...अमित अन्वेष

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