सूत की एक गाँठ अलमारी के भीतर रखी चीज़ों का भी अपना एक जीवन होता है। यह बात अनन्या ने बहुत पहले समझ ली थी। शायद तब जब उसने पहली बार किसी पुराने कागज़ को फेंकने से इनकार किया था। शायद तब जब माँ ने उसे डाँटते हुए कहा था कि घर कोई संग्रहालय नहीं होता और उसने हँसकर जवाब दिया था कि हर घर अपने भीतर थोड़ा-सा इतिहास छिपाकर रखता है। तब वह नहीं जानती थी कि एक दिन वही इतिहास उसके सामने आकर उससे सवाल करेगा। उस शाम भी अलमारी खुली थी। नीचे के खाने में पुराने कागज़ों , अधूरी चिट्ठियों , सम्मेलन के परिचय-पत्रों और कुछ पीले पड़ चुके टिकटों के बीच वह सूत रखा था.... वर्धा से लाया हुआ सूत। एक मामूली-सा धागा। इतना मामूली कि उसे देखकर कोई भी कह सकता था.... इसे इतने वर्षों तक बचाकर रखने की क्या जरूरत थी ? लेकिन चीज़ों की जरूरत हमेशा उनके उपयोग से तय नहीं होती। कुछ चीज़ें इसलिए बची रहती हैं क्योंकि उनके भीतर हमारा कोई बीता हुआ रूप साँस ले रहा होता है। अनन्या ने सूत को हथेली पर रख लिया। उसे अचानक रागिनी याद आई। तेईस वर्ष की रागिनी। एक चेहरा जो अब विश्वविद्यालय के गलियारों में नहीं था। एक ...
उस सुबह रोज़ की तरह
आसमान से झाँक रहा था सूरज
हल्के बादल ज़रूर थे पर हवा तेज़ नहीं थी
फिर भी समुद्र में कल्लोल करने के लिए
इठला रही थीं किनारे पर बंधी नावें
पीटर और पोनम्मा संभाल रहे थे
अपना नायलन से बना
मछली पकड़ने का जाल
वे हर रोज़ निकलते हैं इसी व्यवसाय यात्रा पर!
अद्भुत कहानी है पीटर और पोनम्मा की
जिसे मैंने कल रात
सेंट जोसफ चर्च के पादरी से सुना
चलिए आपको भी सुनाता हूँ।
मछुआरों के बच्चे नहीं खेलते गिल्ली डंडा
उन्हें पसंद नहीं फुटबॉल या हॉकी
वे तो बस चलना सीखते ही
उतर पड़ते हैं समुद्र में
किशोर होते ही सिलने लगते हैं
नायलन का फटा जाल
जिसे रोज घायल कर देती हैं
शैतान मछलियाँ
वयस्क होते ही मछुआरों के बच्चे
समुद्र पर दौड़ाने लगते हैं नावें
जैसे अमीरों के बच्चे
खुली सड़कों पर दौड़ाते हैं स्पोर्ट्स बाइक
वे भयभीत नहीं होते
काले, हरे, नीले उछलते जल से
वे जल से प्रेम करने लगते हैं।
बाईस साल का था फिलिप,
लम्बा, सुते हुए शरीर का काला नौजवान
जिस पर मरती थीं
दर्जनों मछुआरों की अंगड़ाईयाँ तोड़ती बेटियाँ
पर उसे सिर्फ और सिर्फ समुद्र से प्रेम था।
सूर्योदय के साथ ही अपने दोस्त माईकेल को लेकर
वह निकल जाता था दूर गहरे समुद्र में
जहाँ अक्सर नहीं जाती थीं दूसरी नावें
समुद्र में फेंक कर जाल वह रोज़ बजाने लगता था
मैडम लुई से मिला माउथ-ऑर्गन
जिससे निकलती थीं नई नई अनोखी धुनें।
दहाड़ते समुद्र पर फेन की तरह ही
लिपट जाती थीं स्वर लहरियाँ
दसों दिशाओं से
लौट लौट आती थीं स्वर लहरियाँ
माईकेल बताता है
उनके जाल में दूर दूर से
चली आती थीं मछलियाँ
जिन्हें वे उडेलते रहते थे अपनी नाव में
पर फिलिप बजाता ही रहता था माउथ-ऑर्गन
असल में उसे समुद्र पर नाचतीं
माउथ-ऑर्गन से निकली
जादुई धुनों से हो गया था प्यार।
एक दिन फिलिप मस्त होकर बजा रहा था माउथ-ऑर्गन
माईकेल समेट रहा था मछलियों से भरा जाल
अचानक समुद्र से निकली
किसी अप्सरा सी सुंदर एक मत्स्य कन्या
जिसने झाँका फिलिप की आँखों में
कुछ देर के लिए शरमा कर सूर्य छुप गया बादलों में
और वे दोनों किसी प्रेमी युगल की तरह
गायब हो गए उत्ताल समुद्र में।
कितना चिल्लाया माईकेल पर लौटा नहीं फिलिप
उसे ही लौटना पड़ा
तपती दोपहरी में फिलिप के बिना ही।
किसी ने विश्वास नहीं किया माईकेल पर
यहाँ तक की चर्च के पादरी ने भी,
कन्याकुमारी मंदिर के पंडों ने भी नहीं किया
जो अक्सर उन्हें मत्स्य कन्याओं और जल-परियों की
कहानियाँ सुनाया करते थे।
एक दिन चर्च के हॉल की खिड़की से झाँकते हुए
दोपहर की आँखें चौंधिया देने वाली चमक में
पोनम्मा ने देखी समुद्र पर नाचती एक जल-परी
जिसके साथ था
माउथ-ऑर्गन बजाता उसका साँवला-सा फिलिप।
बस उस दिन से पीटर और पोनम्मा
रोज़ सुबह सुबह निकल पड़ते है अपना जाल लेकर
वे पकड़ना चाहते हैं उस मत्स्य-कन्या को
जिसने अपने प्रेम में
फिलिप को बंदी बना लिया है।
सुनेत्रा,
अगर मैं पोनम्मा के कहे पर विश्वास करूँ तो
वहाँ दूर समुद्र में
अब भी बज रहा है माउथ-ऑर्गन
बस फिलिप को छुपा लिया है
उस खूबसूरत जादूगरनी ने!
--------- राजेश्वर वशिष्ठ

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