मैं तो इक नज़्म तक नहीं कह पा रहा जब से तुझ को देखा है चांद कैसे कोई ग़ज़ल कहता होगा तेरे इश्क़ की चांदनी रातों में कैसे कोई ग़ज़ल कहता होगा तेरे इश्क़ की मखमली बाहों में कैसे फूल खिलाते होंगे राहों में यादों के नाज़ुक कोरे पन्नों पर कैसे लबों से शबनम धरता होगा कैसे दरिया का पानी बहता होगा तेरे इश्क की चांदनी रातों में कैसे कोई ग़ज़ल कहता होगा ये सर्द हवाएं है कि तुम हो यहीं कहीं मगर कोई कहता है तुम नहीं हो कहीं कहां हो कैसे हो कैसे जान लेते होंगे इतने दूर से भला कैसे पहचान लेते होंगे यकीनन तू ही उनसे कुछ कहता होगा फिर तू ही छुप-छुप के उन्हें सुनता होगा फिर अचानक आकर ख़बर करता होगा तेरे इश्क़ की चांदनी रातों में कैसे कोई ग़ज़ल कहता होगा बालाएं लेते हुए नरम हाथ होंगे दुआएं देते हुए सितारे साथ होंगे कैसी सुर ताल होगी कैसे गान होंगे रोशनी होगी तो चराग मेहमान होंगे खुश ख्वाहिशों के सारे खानदान होंगे लफ़्ज़ कितने ही महरूम बेजान होंगे कैसे कोई उनमें मानी भरता होगा तेरे इश्क़ की चांदनी रातों में कैसे कोई ग़ज़ल कहता होगा ...
इस समय ज़िंदगी
गणित की एक ऐसी शिक्षिका थी
जो जान चुकी थी
कि मुझे तेरह का पहाड़ा नहीं आता
और अक्सर सत्रह के पहाड़े में
अटक जाती हूँ मैं,
इसीलिए ज़िंदगी मुझे
उलझाए जा रही थी
कुछ ऐसी ही गुना-भाग में,
जैसे तुम मिले मुझे
कुछ घटा और जमा करने के बाद
ज़िंदगी ने दिया मुझे
सबसे कठिनतम पहाड़ा
तुम्हें अलविदा कहने का।
मुझे बचपन से ही पसंद नहीं था
किसी का भी मुझे छोड़ कर चले जाना।
मैं भीतर तक मायूस हो जाती
जब-जब किसी ने विदा ली मुझसे।
मगर तुम्हारा मुझसे अलविदा कहना
छोड़ गया ढेरों सवाल मेरे मन में
जो रह जाएँगे
यूँ ही अनसुलझे से।
यूँ तो कितने ही साथ छूट गये मुझसे
बीच मझदार में
मगर तुमसे ली गई विदा ने
छोड़ दिया कुछ अधूरा सा
उस साथ को
जिसे होना चाहिए था
अनंत और असीमित।
गरिमा भाटी “गौरी”
फ़रीदाबाद, हरियाणा

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