मैं तो इक नज़्म तक नहीं कह पा रहा जब से तुझ को देखा है चांद कैसे कोई ग़ज़ल कहता होगा तेरे इश्क़ की चांदनी रातों में कैसे कोई ग़ज़ल कहता होगा तेरे इश्क़ की मखमली बाहों में कैसे फूल खिलाते होंगे राहों में यादों के नाज़ुक कोरे पन्नों पर कैसे लबों से शबनम धरता होगा कैसे दरिया का पानी बहता होगा तेरे इश्क की चांदनी रातों में कैसे कोई ग़ज़ल कहता होगा ये सर्द हवाएं है कि तुम हो यहीं कहीं मगर कोई कहता है तुम नहीं हो कहीं कहां हो कैसे हो कैसे जान लेते होंगे इतने दूर से भला कैसे पहचान लेते होंगे यकीनन तू ही उनसे कुछ कहता होगा फिर तू ही छुप-छुप के उन्हें सुनता होगा फिर अचानक आकर ख़बर करता होगा तेरे इश्क़ की चांदनी रातों में कैसे कोई ग़ज़ल कहता होगा बालाएं लेते हुए नरम हाथ होंगे दुआएं देते हुए सितारे साथ होंगे कैसी सुर ताल होगी कैसे गान होंगे रोशनी होगी तो चराग मेहमान होंगे खुश ख्वाहिशों के सारे खानदान होंगे लफ़्ज़ कितने ही महरूम बेजान होंगे कैसे कोई उनमें मानी भरता होगा तेरे इश्क़ की चांदनी रातों में कैसे कोई ग़ज़ल कहता होगा ...
किन्तु पीड़ा ने किया ।
वह मेरे जन्म से मेरा साथ गहे है ।
वह ईर्ष्यालु चोर
जिसने पहले मेरे खिलौने चुराए
और फिर छोड़ दिया मुझे मेरी रिक्तता के साथ ।
मेरे बाग में चहकती चिड़ियाँ
उसकी अन्तहीन कराहों से डरती हैं ।
उसने मुझसे मेरी मुहब्बत छीन ली जब मुझे उसकी ज़रूरत थी ।
और फिर छोड़ दिया मुझे एकाकी ।
ओ मेरे पीड़ा! मैं तुझसे नाराज़ हूँ, पर
मेरे पास वक़्त नहीं बचा है तुझसे नफ़रत करने का ।
तेरी बलिष्ठ बाँहों में जकड़ कर क़ैद हुई मैं
प्रेम नहीं, बस तुझे ही चाहती हूँ ।
मैरी एलीज़ाबेथ कोलरिज
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