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कैसे कोई ग़ज़ल कहता होगा...

 मैं तो इक नज़्म तक नहीं कह पा रहा जब से तुझ को देखा है चांद  कैसे कोई ग़ज़ल कहता होगा तेरे इश्क़ की चांदनी रातों में  कैसे कोई ग़ज़ल कहता होगा तेरे इश्क़ की मखमली बाहों में कैसे फूल खिलाते होंगे राहों में यादों के नाज़ुक कोरे पन्नों पर कैसे लबों से शबनम धरता होगा कैसे दरिया का पानी बहता होगा तेरे इश्क की चांदनी रातों में  कैसे कोई ग़ज़ल कहता होगा  ये सर्द हवाएं है कि तुम हो यहीं कहीं मगर कोई कहता है तुम नहीं हो कहीं कहां हो कैसे हो कैसे जान लेते होंगे इतने दूर से भला कैसे पहचान लेते होंगे यकीनन तू ही उनसे कुछ कहता होगा फिर तू ही छुप-छुप के उन्हें सुनता होगा फिर अचानक आकर ख़बर करता होगा तेरे इश्क़ की चांदनी रातों में कैसे कोई ग़ज़ल कहता होगा बालाएं लेते हुए नरम हाथ होंगे दुआएं देते हुए सितारे साथ होंगे कैसी सुर ताल होगी कैसे गान होंगे रोशनी होगी तो चराग मेहमान होंगे खुश ख्वाहिशों के सारे खानदान होंगे  लफ़्ज़ कितने ही महरूम बेजान होंगे  कैसे कोई उनमें मानी भरता होगा तेरे इश्क़ की चांदनी रातों में कैसे कोई ग़ज़ल कहता होगा        ...

मेरे साथी

कविता 

नीड़ के निर्माण में

ईंट पहली डाल कर

चल पड़ा हूँ खोज में -

मै साथियों की!

मै जानता हूँ कि बड़ी मुश्किल डगर है,

मै जानता हूँ कि सभी कांटे उधर हैं,

मै जानता हूँ कि उधर है मौत का दरिया,

पर उसी के पार है मेरे साथियों का घर।

मेरे साथी जो बहक गए हैं

किसी शातिर के भुलावे में पड़कर

उनकी आँखों पर परदा डाल दिया है

आधुनिकता का, भौतिकता का, थोथी नैतिकता का

कुछ और भी हैं जो जाल फैंकते हैं

उन्हे अपनी हरम में लेने के लिए

कोई त्रिशूल देता है कोई बंदूक देता है

कोई जेहादी बनाता है कोई समाजवादी।

मेरे अबोध साथी जो -

खेतों में काम करते थे,

परिवार के साथ हंसी खुशी रहते थे,

सरसों का साग मक्के की रोटी खाते थे,

तुतलाती बिटिया का माथा चूमते थे;

बैलों की जोड़ी हीरा-मोती

एक कुत्ता झबरा भी होता था उनका...

खलिहान का बूढ़ा बरगद, और

उसकी छावं में बैठती पंचायत,

फिर कौवे की कावं -कावं...

...सब छोड़ दिया साथियों ने

मेरे साथियों की ये हालत

सरकार की रणनीति के कारण है,

पूरा-पूरा हाथ है इन बुद्धिजीवियों का,

बगिया को छिन्न -भिन्न करने में!

मेरे साथियों ने कभी नहीं चाहा,

कि सर कलम हो अपनों का

सपनों का, मान का, सम्मान का।

पर क्या करें? चाल समझ ही नहीं पाए।

अब मुझे ही कुछ करना होगा,

उन सियारों से लड़ना होगा,

जो हूँआँ-हूँआँ की राजनीति करते हैं।

मेमनों की घास से अपना पेट भरते है।

कहते हैं, 'अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ता'

यह सच भी है और

यह भी सच है कि

मै भी एक नैतिकतावादी सियार ही हूँ!

अगर कुछ है, तो

हमें चिंता है अपने साथियों की

मेरे साथी मेरे साथ हो जाएं तो  

मुझमें प्रतिभा है शेर बनने की

सवा-शेर को भी मै धूल चटा सकता हूँ।

नीड़ के निर्माण में

ईंट तो ईंट है

मै पत्थर जमा सकता हूँ।  

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