मैं तो इक नज़्म तक नहीं कह पा रहा जब से तुझ को देखा है चांद कैसे कोई ग़ज़ल कहता होगा तेरे इश्क़ की चांदनी रातों में कैसे कोई ग़ज़ल कहता होगा तेरे इश्क़ की मखमली बाहों में कैसे फूल खिलाते होंगे राहों में यादों के नाज़ुक कोरे पन्नों पर कैसे लबों से शबनम धरता होगा कैसे दरिया का पानी बहता होगा तेरे इश्क की चांदनी रातों में कैसे कोई ग़ज़ल कहता होगा ये सर्द हवाएं है कि तुम हो यहीं कहीं मगर कोई कहता है तुम नहीं हो कहीं कहां हो कैसे हो कैसे जान लेते होंगे इतने दूर से भला कैसे पहचान लेते होंगे यकीनन तू ही उनसे कुछ कहता होगा फिर तू ही छुप-छुप के उन्हें सुनता होगा फिर अचानक आकर ख़बर करता होगा तेरे इश्क़ की चांदनी रातों में कैसे कोई ग़ज़ल कहता होगा बालाएं लेते हुए नरम हाथ होंगे दुआएं देते हुए सितारे साथ होंगे कैसी सुर ताल होगी कैसे गान होंगे रोशनी होगी तो चराग मेहमान होंगे खुश ख्वाहिशों के सारे खानदान होंगे लफ़्ज़ कितने ही महरूम बेजान होंगे कैसे कोई उनमें मानी भरता होगा तेरे इश्क़ की चांदनी रातों में कैसे कोई ग़ज़ल कहता होगा ...
बसंत में यहाँ पत्तियाँ
झुलस जाती हैं
झुरझुरा जाते हैं डाल
...और तीखी धूप में-
कार कुच-कुच हो जाता है विषधर
चमकता हुआ एकदम लोहटन सा!
इस बेस्वादी समय में-
बच्चे विश्वविद्यालय के ढाबों पर
चाय की दो घूँट से
अपने भीतर चषक भरते हैं,
सूने में जीवन को तरासने की
एक मुकम्मल कोशिश;
एक सुंदर आकृति-
पहाड़ियों के बीच में,
तपती दुपहरी में।
फहफह कपास सिकुड़ कर
टिमटिमा रहा होता है मद्धिम-मद्धिम!
जैसे दीये में
लगा दिये हों
बिना तेल की बाती।
नवनीत सिंह
महात्मा गांधी अं. हिं. विश्वविद्यालय वर्धा

सरल और बढ़िया शुभकामनाएं
ReplyDeleteवर्धा के इस अनुभव को शाब्दिक बनाने हेतु आभार बड़े भय्या🙏🙏
ReplyDeleteबहुत खूब, अनुभवों को शाब्दिक अभिव्यक्त देना आपसे कोई सीखें। 🥰
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